साहित्य सरोकार : सावन आया कैसा...

साहित्य सरोकार : सावन आया कैसा...

दीपा शर्मा  "उजाला" के साहित्य सृजन की दो कविताएं

यह कैसा सावन आया 
तन भीगा पर मन भीग ना पाया

बादलों ने जी भर बरसाया 
पर मन की प्यास बुझा ना पाया
कान्हा की मुरली पर 
राधा को मयूर बन नचाया 
अब क्यों ना वह सावन आया
 यह कैसा सावन आया 

जीवन नीर हर तरफ पसराया
वही जलजला बन 
भयानक तबाही लाया 
बुधना का छप्पर 
क्यों कर उडाया है 
यह अमृत मय सावन 
क्यों नहीं आया 

है सखी मुझको तुझको था इंतजार

नैहर से संदेश ले आएगा कहार 
अब ना रहा वह पहले सा प्यार 
ना आया कहार ना पूरा हुआ इंतजार
 मनकी मन में रह गई 
सखी सहेली छूट गई
 सावन के झूले रंग हीन हुए
 देहरी भी बाबुल की छूट गई है
 रे सखी यह कैसा 
सावन का इंतजार 

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मन के भावों को दिखा जाता आंखों की ओट से

कौन कहता है कि
सावन बस आसमान से बरसता है 
बादलों की ओर से बिजली 
की कौंध सा चमकता है
क्या तुमने कभी देखा 
आंखों से बरसते सावन को
कभी रिमझिम रिमझिम
सरल सुहाना सावन

तो कभी लाल लाल आंखों से
 गरजता तिलमिलाता सावन 
कभी अकेले बंद कमरे में 
चुपचाप धीमी धीमी आवाज 
में सिसकता सावन 

कभी हंसी के ठहाको में 
चुपके से आंखों की कोर से
मोती बन सरकता सावन 
बादलों का सावन आता है 

वर्ष में एक बार 
पर यह सावन
कभी भी उमडघूमड
कर बरस जाता है
मन के भावों को
आंखों की ओट से दिखा जाता है

दीपा शर्मा, "उजाला"
फरीदाबाद