विचार सरोकार : पंजीयन पुराण

किन्तु महाशयों ने शायद "पंजीयन" और "अस्तित्व" के बीच का भेद कुछ अधिक ही सरल मान लिया। धर्म, संस्कृति और सभ्यता दफ्तरों की फाइलों से नहीं, बल्कि युगों के अनुभव, आचार, विचार, शास्त्र, शिलालेख, लोकपरम्पराओं और जनजीवन से प्रमाणित होते हैं।

विचार सरोकार : पंजीयन पुराण

डमरू का रजिस्ट्रेशन क्रमांक कहाँ है?

⚫ बृजेश कुमार त्रिवेदी

कहते हैं कि कलियुग में प्रश्नों का अकाल नहीं है, केवल उत्तरों की खेती थोड़ी दुर्बल हो गई है। अभी हाल में एक बड़ा विलक्षण दर्शन सुनने को मिला—"यदि कोई संस्था पंजीकृत नहीं है, तो क्या हुआ? हिन्दू धर्म भी तो पंजीकृत नहीं है!"

यह सुनकर संभवतः ब्रह्माजी ने सृष्टि-निर्माण का कार्य कुछ क्षण के लिए स्थगित कर दिया होगा और चित्रगुप्त जी ने अपने अनंत अभिलेखों के पन्ने उलटते हुए सोचा होगा कि कहीं युगों से चल रहे लेखा-जोखा का भी कोई पंजीयन क्रमांक लेना तो शेष नहीं रह गया!

तो कोयल के मधुर स्वर का पंजीयन होता हर 5 साल में

तब मन में जिज्ञासा जागी कि जब प्रश्न निकला ही है, तो कुछ और भी पूछ लिया जाए। भगवान शंकर के डमरू से प्रकट महेश्वर सूत्रों का पंजीयन किस कार्यालय में हुआ था? सूर्यदेव प्रतिदिन जल का वाष्पीकरण करते हैं, क्या उसके लिए पर्यावरण विभाग से अनुमति ली जाती है? वसंत आते ही वृक्षों में जो नवपल्लव और मंजरियाँ प्रकट होती हैं, क्या उनके लिए किसी नगर निगम से अनापत्ति प्रमाण-पत्र प्राप्त किया जाता है? और कोयल के मधुर स्वर का नवीनीकरण प्रत्येक पाँच वर्ष में होता है अथवा वह स्थायी लाइसेंस के अंतर्गत आता है?

सीमित समझ बैठा अभिलेखों को

किन्तु महाशयों ने शायद "पंजीयन" और "अस्तित्व" के बीच का भेद कुछ अधिक ही सरल मान लिया। धर्म, संस्कृति और सभ्यता दफ्तरों की फाइलों से नहीं, बल्कि युगों के अनुभव, आचार, विचार, शास्त्र, शिलालेख, लोकपरम्पराओं और जनजीवन से प्रमाणित होते हैं। वेदों, उपनिषदों, पुराणों, स्मृतियों, संत-साहित्य और अनगिनत अभिलेखों का इतना विशाल भंडार देखकर भी यदि कोई यह कहे कि "यह पंजीकृत नहीं है", तो संभवतः वह अभिलेखों को केवल स्टाम्प पेपर और रजिस्टर नंबर तक सीमित समझ बैठा है।

यह भी रोचक

विचित्रता का दूसरा अध्याय और भी रोचक है। इस देश में बालक जन्म ले तो उसका पंजीकरण आवश्यक, देहावसान हो तो मृत्यु का पंजीकरण आवश्यक। घर खरीदो तो पंजीयन, वाहन लो तो पंजीयन, व्यापार करो तो पंजीयन, कंपनी बनाओ तो पंजीयन, बैंक खाता खोलो तो केवाईसी, मोबाइल लो तो पहचान-पत्र, गैस लो तो आधार, पेंशन लो तो जीवन प्रमाण, और तो और, विद्यालय में प्रवेश से लेकर श्मशान तक मनुष्य अभिलेखों के मध्य ही अपनी यात्रा पूर्ण करता है।

नियमों की पृथक गंगा

ऐसे देश में यदि कोई संस्था यह कहे कि विधिक व्यवस्थाएँ तो संसार के लिए हैं, हमारे लिए नहीं, तो जिज्ञासा स्वाभाविक है। आखिर जन्म प्रमाण-पत्र से लेकर मृत्यु प्रमाण-पत्र तक यदि सामान्य नागरिक व्यवस्था का पालन करे, तो संस्थाएँ किस दिव्य लोक की निवासी हैं कि उनके लिए नियमों की पृथक गंगा बहती है?

अनुपम उदाहरण अनुशासन का

और अनुशासन की बात तो अद्भुत है। टोपी एक रंग की, शर्ट एक रंग की, पैंट एक रंग की, मोज़े एक रंग के, कदमताल एक गति की, पंक्ति एक सीधी, समय एक निश्चित। यहाँ तक कि सीटी की ध्वनि पर भी सबकी दिशा एक हो जाती है। अनुशासन का ऐसा अनुपम उदाहरण कि इंद्रदेव भी स्वर्ग की सभा में प्रशंसा करें।

विराट विस्तार कहां से

किन्तु यहीं एक विनम्र प्रश्न जन्म लेता है—जब वस्त्रों के रंगों में इतनी एकरूपता आवश्यक है, तब विधिक स्वरूप में इतनी विविधता का आग्रह क्यों? जब जूतों की पॉलिश तक नियमों से बँधी हो, तब संस्थागत उत्तरदायित्व के विषय में दार्शनिक स्वतंत्रता का यह विराट विस्तार कहाँ से प्रकट हो जाता है?

उसकी धारा केवल कल्पना

फिर स्मरण आता है कि शब्दों के साथ खेलना सरल है, परन्तु उनके अर्थों के साथ खेलना कभी-कभी हास्य का विषय बन जाता है। "पंजीयन" एक विधिक व्यवस्था है, और "अभिलेख" एक व्यापक सांस्कृतिक सत्य। दोनों को मिलाकर खिचड़ी बनाना वैसा ही है जैसे कोई यह कहे कि हिमालय का भू-अभिलेख नहीं है, अतः पर्वत का अस्तित्व संदिग्ध है; या गंगा का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ, अतः उसकी धारा केवल कल्पना है।

डमरू का पंजीयन किस तहसील में सुरक्षित

और यदि तर्क का यह रथ इसी वेग से चलता रहा, तो शीघ्र ही कोई महापुरुष यह भी पूछ बैठेगा कि बसंत ऋतु का पंजीयन प्रमाण-पत्र कहाँ है, कोयल के कंठ का लाइसेंस किस कार्यालय ने जारी किया, और भगवान शंकर के डमरू का रजिस्ट्रेशन नंबर किस तहसील में सुरक्षित है?

मर्यादा समझना होती है अग्नि से खेलने की

अंततः इतना ही कहा जा सकता है कि धर्म किसी कार्यालय की मुहर का मोहताज नहीं होता, किन्तु संस्थाएँ विधि के अधीन होती हैं। सूर्य को प्रकाश देने के लिए नगरपालिका की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती, किन्तु नगर में दीपक जलाने वाले को भी अग्नि से खेलने की मर्यादा समझनी पड़ती है।

कहां कराया तर्कों का पंजीयन

अतः, शब्दों का प्रयोग करने से पूर्व उनके अर्थों का भी थोड़ा-सा पंजीयन बुद्धि में कर लेना चाहिए, अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि कल को चित्रगुप्त जी स्वयं स्वर्ग के द्वार पर खड़े होकर पूछ बैठें— "वत्स ! पृथ्वी से तो बहुत प्रमाण-पत्र लाए हो, किंतु अपने तर्कों का पंजीयन कहाँ कराया है?"

बृजेश कुमार त्रिवेदी