साहित्य रचना : कहें सबको ईद मुबारक ऐसे
कहें सबको ईद मुबारक ऐसे जैसे आफताब मेहताब हो जाए चैनो-अमन की बहे ठंडी हवा आग-ए-नफरत आब-ए-जमजम हो जाए।
⚫ मंजुला पाण्डेय
अब्र में छुपा है चांद
ईद कहां से हो,
पसरा चिलमन में पहरा
दीद कहां से हो

रात की सियाही में
सिमट जाते सब ख्वाब
रूह तक जो न उतरे
प्रीत कहां से हो।
दिल ही बंद दरवाज़ा है
राह खुद की ही रोके ,
जब तक खुले न ये
तो मीत कहां से हो।
लब पे नाम ठहरा है
सांसों में बसा है कोई,
जब तक न इज़हार हो
सुरगीत कहां से हो।
तू अगर न उजले तो
रात और गहरी है,
बिन तेरे उजालों के
जीत कहां से हो।
अपने घर चुल्हा जले
पले पङोस में भूख
मुफ़लिसी सन्नाटा लगे
संगीत कहां से हो।
बुझाकर चराग-ए-नफरत
सब दीन एक हो जाएं
सुकूं -ए-गिरफ्त में सजकर
आज सबकी ईद हो जाए ।
कहें सबको ईद मुबारक ऐसे
जैसे आफताब मेहताब हो जाए
चैनो-अमन की बहे ठंडी हवा
आग-ए-नफरत आब-ए-जमजम हो जाए।
⚫ मंजुला पांडेय, उत्तराखंड
Hemant Bhatt