शख्सियत : बेरोजगारी के कारण सामाजिक एवं आर्थिक अपराधों में बढ़ोतरी

आजादी के बाद से ही बेरोजगारी एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा रहा है, हालांकि समय के साथ इसके स्वरूप में बहुत बदलाव आया है। एक समय था जब डिग्री योग्यता का सही मापदंड थी, जिसके हाथ में होने से ही यह भाव आता था कि अब भविष्य सुरक्षित है, लेकिन आज स्थिति यह है कि डिग्रियों की फाइलें तो मोटी होती जा रही हैं पर उस अनुपात में रोजगार के अवसर सीमित हो रहे हैं।

शख्सियत : बेरोजगारी के कारण सामाजिक एवं आर्थिक अपराधों में बढ़ोतरी

कवयित्री डाक्टर विभा नायक का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है जो व्यक्ति, परिवार और पूरे समाज को अंदर से खोखला कर देती है। इसके कारण मानसिक तनाव, आर्थिक तंगी और सामाजिक अपराध वृध्दि जैसी कई खतरनाक स्थितियां पैदा होती हैं।’

कवयित्री विभा नायक का यह कहना है। एक सवाल के जवाब में इन्होंने कहा कि आजादी के बाद से ही बेरोजगारी एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा रहा है, हालांकि समय के साथ इसके स्वरूप में बहुत बदलाव आया है। एक समय था जब डिग्री योग्यता का सही मापदंड थी, जिसके हाथ में होने से ही यह भाव आता था कि अब भविष्य सुरक्षित है, लेकिन आज स्थिति यह है कि डिग्रियों की फाइलें तो मोटी होती जा रही हैं पर उस अनुपात में रोजगार के अवसर सीमित हो रहे हैं।

शिक्षा में आया बड़ा बदलाव

 विभा जी का कहना था कि आजादी से अब  तक शिक्षा की स्थिति में बहुत बदलाव आया है। 1947 में जब देश आजाद हुआ था तो भारत की साक्षरता दर केवल 12 प्रतिशत थी। जिसमें सुधार हेतु शिक्षा व्यवस्था में कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए। कोठारी आयोग (1964-66), शिक्षा नीतियां (1968, 1986), शिक्षा का अधिकार अधिनियम (2009) और नई शिक्षा नीति (2020) जैसी पहलों के जरिए भारतीय शिक्षा व्यवस्था का कायाकल्प हुआ। आज की स्थिति देखें तो शिक्षा दर 77 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।

शिक्षा का मौलिक अधिकार

 विभा जी ने बताया कि संवैधानिक और कानूनी अधिकार एक्ट 2009 के अंतर्गत 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार प्राप्त हुआ है। जिसमें स्कूलों में बच्चों का नामांकन 95 प्रतिशत तक पहुंचा है। वहीं उच्च शिक्षा की स्थिति में भी बहुत सुधार हुआ है। आजादी के बाद आईआईटी, आईआईएमएस, नीट और केंद्रीय विश्वविद्यालयों का निर्माण हुआ, जिन्होंने भारत को वैश्विक स्तर पर तकनीकी और वैज्ञानिक जनशक्ति प्रदान की।

बेरोजगारी जस की तस

 विभा जी का कहना था कि लेकिन सोचने की बात  यह है कि इस सबके बावजूद भी देश में बेरोजगारी की समस्या जस की तस बनी हुई है। क्या कारण है कि देश का युवा सालों-साल पढ़ाई में लगाता है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपने समय को खपा देता है, पर अंत में  उसके हाथ सिर्फ निराशा ही लगती है! जिसका परिणाम यह हो रहा है कि बेरोजगारी सिर्फ नौकरियों की कमी तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह युवाओं में गहराते मानसिक तनाव और सामाजिक असंतोष का कारण भी बन रही है।

ग्यारह वर्षों से अध्यापन

दिल्ली में श्री स्वतंत्र कुमार नायक और श्रीमती सीमा के घर जन्मी विभा जी विगत 11 वर्षों से श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कर रही हैं। आपको अनेक सम्मानों से नवाजा जा चुका है जिनमें 2013 उदंत मार्तंड सम्मान, 2023 गोल्डन माइक सम्मान, 2025 नारी शक्ति सम्मान आदि। इनकी रचनाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी से होता रहा है।

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन

गगनांचल, प्राथमिक शिक्षक, साहित्य अमृत, समकालीन साहित्य, सम्वेद, संस्कृति भारती, भारत-वैभव, कथादेश, सहृदय, तुलसी मानस भारती आदि पत्रिकाओं में लेखों एवं कहानियों का निरंतर प्रकाशन होता रहा है। इसके अलावा भारतीय ज्ञान परम्परा और रामचरित मानस से संबद्ध विषयों पर कई लेखों का प्रकाशन भी हो चुका है। ’कैद आवाजें,’ ’कुछ नहीं है’ इनके कविता संकलन हैं। आप व्यापक स्तर पर अनुवाद कार्य भी करती रही हैं। शेफालिका उवाच शीर्षक से वर्ष 2007 से ब्लॉग लेखन करती रही हैं। 

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विभा नायक की कविताएं

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जीवन और तुम

मैंने जब-जब जीवन देखा 
उसका रंग सुनहरा देखा 
सत रंगों को गोद समेटे 
मैंने तुममें घुलते देखा 
जीवन की महकी- सी बगिया 
सपनों सी सुंदर- सी छवियाँ  
मैंने जब-जब गुनीं हृदय में 
रूप रुपहला तुम सा देखा 
आकाशी चांदी सी बारिश 
जीवन को जीने की ख्वाहिश 
सपनों को जो प्राण दे सकें 
इच्छाओं को तुम में देखा 
अग्नि की ज्वाला सी चंचल 
गंगा की धारा सी निर्मल 
राम प्राण हो जहाँ रमे हों 
अंतस्तल वह तुममें देखा 
अनुभव के पन्नों में तोले 
शब्दों के वो कितने जोड़े 
जो मुझको आशीष हुए हैं 
उन मंत्रों में तुमको देखा 
जीवन अनुभव और स्वप्नों का 
एक अनोखा रंगस्थल है 
पर इस रंगस्थल में मैंने 
कभी न हारा जीवट देखा 
छोटे से जीवन में अब तक
देख लिया है उलट-पलट सब 
लेकिन पुण्य मूर्ति को देखा 
तो बस कुछ-कुछ तुम-सा देखा।

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ऊँचाई

एक था पहाड़
मजबूत फौलादी
व्यापक भूखंड पर
देह पसारे
उसकी एक-एक चढ़ान पर
जीवन रस पा रही थीं
न जाने कितनी वनस्पतियाँ
फूट रहे थे झरने
जगह-जगह
हिम आच्छादित उसके शिखर
उसकी भव्यता का थे प्रमाण
गरजते बादल, उमड़ती हवाएँ
बेदम हो जाती थीं
उसके आगे और 
सिहरा देती थी
आकाश से बातें करती
उसकी विराटता 
पर देखती हूँ कि 
उस भूधर की बगलों से
अब झड़ने लगी है रेत!
और दरक उठी जमीन भी धीरे धीरे!
पहाड़ टूट रहा है
पत्थर पत्थर
मैं देख रही हूँ  
सामर्थ्य और सौन्दर्य को
पर ऊँचाई?
उसमें जरूर खोट है।

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कविता 

मैं जब चुपचाप होती हूँ
वो बोलती है
अन्तर्मन के गहरे कपाट खोलती है
वो घूम आती है विश्व
और उसकी परतों की बुनावट
और बे-कलम ही 
उन्हें उकेर देती है
वो अंदर बहुत अंदर उतर
चेतनाओं को भी सुन आती है
और गढ़ देती है उनके संवाद 
वो तैरती भी है और
हवाओं सी घुल 
पहुँच जाती है हर ओर
वो बरस पड़ती है रेगिस्तानों में 
छमाछम और खिल उठती है 
रुके हुए पानी में भी
वो बहती है आत्माओं में भी
और उभर आती है सशरीर
वो बोलती है न जाने 
कितनी बोलियाँ गुपचुप
और मैं पकड़ती रह जाती हूँ
उनमें छिपी कितनी ही 
अनसुनी ध्वनियाँ 
जो कविता बोलती है
अनगिनत भाषाओं में।

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हिरन मन

मैं उसे रोकती हूँ
उम्र का तकाजा देकर टोकती हूँ
करती हूँ सलीके और समाज की बात
समझाती हूँ उसे सौ-सौ बार
बहलाती हूँ उसे
दुनियावी किस्सों से
डराती हूँ उसे सख्त उसूलों से
दिखाती हूँ उसे भविष्य का विद्रूप भी
पर नजरंदाज करता 
वो मेरी हर बात
मुस्कुराकर फिसलता जाता है
मेरी हर गिरफ्त से
और मेरी आवाज की गूँज
मेरी नजर की सीमा से कहीं आगे 
वो पहुँच जाता है 
ऊँचे आसमानों में
असीम दिशाओं में
पर्वत, समतल, जंगल, मरुस्थल
गहरे महासागर और 
स्मृति-विस्मृति के सूक्ष्म अन्तरालों में भी..
और तब बुजुर्गियत सी ओढ़े 
मैं ठहर जाती हूँ हैरान
अपने हिरन मन की कुलाँच पर।

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ध्वनि

मैं रोज जीती हूँ एक कविता
और रोज पी जाती हूँ उसे 
वायु में घोलकर
मैं रोज जीती हूँ एक जीवन
और दिन ढलने के साथ ही
मरोड़कर रख लेती हूँ उसे
अपने तकिये के नीचे
मैं रोज उम्र के धागों से 
बुनती हूँ ख्वाब
और उधेड़ देती हूँ उन्हें 
अगली सुबह तक
प्रत्येक क्षण मैं 
समेटती हूँ अनंत सृष्टि
और एक निरूश्वास के साथ ही 
मैं हो जाती हूँ आकाश
मेरी आँखें बनातीं हैं एक पुल 
बाहर और अंदर 
हृदय की रेतीली जमीन 
दरक जाती है गहरे और गहरे
नक्षत्रों के आगे, स्वप्नों से भी तीव्र
ब्रह्मांडीय अस्तित्व से सुदूर
कोई व्यतिक्रम खेलता
बैठकर चुपचाप
फिर भी मैं उकेरती हूँ विश्व 
समेटती जाती हूँ 
आकाश-पृथ्वी की परतें
और देखती हूँ खुद को घुलते जाना
आकाश और पृथ्वी होते जाना

यूँ ही मैं रोज 
जीती हूँ अस्तित्व
और बिखरा देती हूँ उसे
कविता के अस्फुट शब्दों में।